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श्री भक्तमाल – श्री दादू दीनदयाल जी

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संतो का हृदय कैसा होता है –संत दादू दयाल जी भिक्षा मांगने जिस रास्ते से निकलते वहां बीच मे एक ऐसा घर पड़ता था जहां रहने वाला व्यक्ति दयाल जी की भरपूर निंदा करता था ।

उनको देखते ही कहता था – बडा संत बना फिरता है, बड़ा ज्ञानी बना फिरता है । कई प्रकार के दोष गिनाता और अंदर चला जाता ।

कई बार जब वह निंदक नजर नहीं आता तब भी दयाल जी उसके मकान के सामने कुछ देर प्रतीक्षा करते और आगे बढ़ जाते ।

कुछ दिन वह निंदक नही दिखाई पड़ा तो दयाल जी ने आसपास पूछा । पूछने पर पता लगा की उस व्यक्ति की मृत्यु हो गयी है।

इस बात से दयाल जी अत्यंत दुःखी होकर जोर जोर से रोने लगे । शिष्य ने पूछा – गुरुदेव ! आप क्यों रोते हो?

शिष्य बोला – वह तो आपका निंदक था , वह मर गया तो आप को प्रसन्न होना चाहिए परंतु आप तो रो रहे है – ऐसा क्यों ?

दयाल जी बोले – वह मेरी निंदा करके मुझे सदा स्मरण करवाता रहता था कि मैं कोई संत महात्मा नहीं हूँ, मैं कोई ज्ञानी नहीं हूँ।

वह मुझे स्मरण कराता रहता था कि यह संसार कांटो से भरा है । वह मुझे ज्ञान और त्याग का अहंकार नहीं होने देता था । वह बडा नेक इंसान था, अब उसके जाने पर मेरे मन का मैल कौन धोएगा ?

निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,

बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।

अर्थात् 🙂 जो हमारी निंदा करता है, उसे अपने अधिकाधिक पास ही रखना चाहिए। वह तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बता कर हमारे स्वभाव को साफ़ करता हैं ।

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